Abbas Tabish Poetry Urdu | Abbas Tabish Shayari in Hindi & Ghazal |

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Abbas Tabish Poetry

 

abbas tabish shayari in hindi

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Tálásm Kháwáb Se Merá Bádán Páthár Náhi Hotá
Meri Jáb áánkh Khulti Hái Mein Bistár Pár Náhi Hotá

 

 

Tu Bhi áe Shákhs Káhán Ták Mujhe Bárdásht Kárey
Bár Bár áik Hi Chehrá Náhi Dekhá Játá

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Ye Mohábát Ki Káháni Náh Imárti Lekin
Log Qárdáár Nibáhte Hoye Már Jááte Háin

 

 

 

 

Hám Hái Sokhe Hoye Táláb Pe Betháy Hoye Háns
Jo Táluq Nibáhte Hoye Már Jááte Háin

 

abbas tabish poetry

Abbas Tabish Poetry in Hindi

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Bás áik Mor Meri Zindági Máin áyá Thá
Phir Us Ke Báád Uljáti Gáyi Káháni Meri

 

 

 

Jhonke Ke Sáth Chát Gáyi Dásták Ke Sáth Dár Gáyá
Tázá Háwá Ke Shoq Mein Merá Tu Sárá Ghár Gáyá

 

 

 

 

Teri Rooh Mein Sánátá Hái áur Meri ááwáz Mein Chup
Tu ápnáy ándááz Mein Chup Hái, Mein ápnáy ándááz Mein Chup

 

 

 

 

 

Fáqát Máál-O Zár Dewáár-O Dár áchá Náhi Lágtá
Jáhán Báchy Náhi Hote Wo Ghár áchá Náhi Lágtá

 

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Ghár Pohnchtá Hái Koi áur Hámáre Jesá
Hám Tere Shehr Se Jááte Hoye Már Jááte Háin

 

 

 

áánkhon Ták Ná áá Sáki Kábhi áánsuon Ki Lehár
Ye Qááflá Bhi Náqál Mákáni Mein Kho Gáyá

 

 

 

 

Mein Jis Sákoon Se Bethá Hun Is Kináre Pár
Sákoon Se Lágtá Hái Merá Qáyáám áákhri Hái

 

 

 

áik Mudát Se Meri Máá Náhi Soyi Tábish
Máin Ne Ik Bár Káhá Thá Mujhe Dár Lágtá Hái

 

Abbas Tabish Poetry in Hindi

 

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Abbas Tabish Shayari in Hindi

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ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन
लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

 

 

 

ये मौज मौज बनी किस की शक्ल सी ‘ताबिश’
ये कौन डूब के भी लहर लहर फैल गया

 

 

 

वर्ना कोई कब गालियाँ देता है किसी को
ये उस का करम है कि तुझे याद रहा मैं

 

 

 

वक़्त लफ़्ज़ों से बनाई हुई चादर जैसा
ओढ़ लेता हूँ तो सब ख़्वाब हुनर लगता है

 

 

 

तू भी ऐ शख़्स कहाँ तक मुझे बर्दाश्त करे
बार बार एक ही चेहरा नहीं देखा जाता

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Abbas Tabish Poetry Books Pdf download

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उन आँखों में कूदने वालो तुम को इतना ध्यान रहे
वो झीलें पायाब हैं लेकिन उन की तह पथरीली है

 

 

 

तिलिस्म-ए-ख़्वाब से मेरा बदन पत्थर नहीं होता
मिरी जब आँख खुलती है मैं बिस्तर पर नहीं होता

 

 

 

तेरी रूह में सन्नाटा है और मिरी आवाज़ में चुप
तू अपने अंदाज़ में चुप है मैं अपने अंदाज़ में चुप

 

 

 

सुन रहा हूँ अभी तक मैं अपनी ही आवाज़ की बाज़गश्त
यानी इस दश्त में ज़ोर से बोलना भी अकारत गया

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तिरी मोहब्बत में गुमरही का अजब नशा था
कि तुझ तक आते हुए ख़ुदा तक पहुँच गए हैं

 

 

 

शब की शब कोई न शर्मिंदा-ए-रुख़स्त ठहरे
जाने वालों के लिए शमएँ बुझा दी जाएँ

 

 

 

रात को जब याद आए तेरी ख़ुशबू-ए-क़बा
तेरे क़िस्से छेड़ते हैं रात की रानी से हम

 

 

 

फिर इस के ब’अद ये बाज़ार-ए-दिल नहीं लगना
ख़रीद लीजिए साहिब ग़ुलाम आख़िरी है

 

 

 

रात कमरे में न था मेरे अलावा कोई
मैं ने इस ख़ौफ़ से ख़ंजर न सिरहाने रक्खा

 

 

 

पस-ए-ग़ुबार भी उड़ता ग़ुबार अपना था
तिरे बहाने हमें इंतिज़ार अपना था

 

 

 

पहले तो हम छान आए ख़ाक सारे शहर की
तब कहीं जा कर खुला उस का मकाँ है सामने

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मिलती नहीं है नाव तो दरवेश की तरह
ख़ुद में उतर के पार उतर जाना चाहिए

 

 

 

मेरे सीने से ज़रा कान लगा कर देखो
साँस चलती है कि ज़ंजीर-ज़नी होती है

 

 

 

मसरूफ़ हैं कुछ इतने कि हम कार-ए-मोहब्बत
आग़ाज़ तो कर लेते हैं जारी नहीं रखते

 

 

 

मेरा रंज-ए-मुस्तक़िल भी जैसे कम सा हो गया
मैं किसी को याद कर के ताज़ा-दम सा हो गया

 

 

 

मकीं जब नींद के साए में सुस्ताने लगें ‘ताबिश’
सफ़र करते हैं बस्ती के मकाँ आहिस्ता आहिस्ता

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मैं जिस सुकून से बैठा हूँ इस किनारे पर
सुकूँ से लगता है मेरा क़याम आख़िरी है

 

 

मैं अपने आप में गहरा उतर गया शायद
मिरे सफ़र से अलग हो गई रवानी मिरी

 

 

 

मैं हूँ इस शहर में ताख़ीर से आया हुआ शख़्स
मुझ को इक और ज़माने में बड़ी देर लगी

 

Tabish Poetry on Mother

 

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ایک مدت سے مری ماں نہیں سوئی تابشؔ
میں نے اک بار کہا تھا مجھے ڈر لگتا ہے

Abbas Tabish Urdu ghazal

 

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ہنسنے نہیں دیتا کبھی رونے نہیں دیتا
یہ دل تو کوئی کام بھی ہونے نہیں دیتا

تم مانگ رہے ہو مرے دل سے مری خواہش
بچہ تو کبھی اپنے کھلونے نہیں دیتا

میں آپ اٹھاتا ہوں شب و روز کی ذلت
یہ بوجھ کسی اور کو ڈھونے نہیں دیتا

وہ کون ہے اس سے تو میں واقف بھی نہیں ہوں
جو مجھ کو کسی اور کا ہونے نہیں دیتا

 

 

 

 

 

عجیب طور کی ہے اب کے سرگرانی مری
میں تجھ کو یاد بھی کر لوں تو مہربانی مری

میں اپنے آپ میں گہرا اتر گیا شاید
مرے سفر سے الگ ہو گئی روانی مری

بس ایک موڑ مری زندگی میں آیا تھا
پھر اس کے بعد الجھتی گئی کہانی مری

تباہ ہو کے بھی رہتا ہے دل کو دھڑکا سا
کہ رائیگاں نہ چلی جائے رائیگانی مری

میں اپنے بعد بہت یاد آیا کرتا ہوں
تم اپنے پاس نہ رکھنا کوئی نشانی مری

 

 

 

 

 

 

پانی آنکھ میں بھر کر لایا جا سکتا ہے
اب بھی جلتا شہر بچایا جا سکتا ہے

ایک محبت اور وہ بھی ناکام محبت
لیکن اس سے کام چلایا جا سکتا ہے

دل پر پانی پینے آتی ہیں امیدیں
اس چشمے میں زہر ملایا جا سکتا ہے

مجھ گمنام سے پوچھتے ہیں فرہاد و مجنوں
عشق میں کتنا نام کمایا جا سکتا ہے

یہ مہتاب یہ رات کی پیشانی کا گھاؤ
ایسا زخم تو دل پر کھایا جا سکتا ہے

پھٹا پرانا خواب ہے میرا پھر بھی تابشؔ
اس میں اپنا آپ چھپایا جا سکتا ہے

 

 

 

 

 

 

 

دشت میں پیاس بجھاتے ہوئے مر جاتے ہیں
ہم پرندے کہیں جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں سوکھے ہوئے تالاب پہ بیٹھے ہوئے ہنس
جو تعلق کو نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

گھر پہنچتا ہے کوئی اور ہمارے جیسا
ہم ترے شہر سے جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

کس طرح لوگ چلے جاتے ہیں اٹھ کر چپ چاپ
ہم تو یہ دھیان میں لاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ان کے بھی قتل کا الزام ہمارے سر ہے
جو ہمیں زہر پلاتے ہوئے مر جاتے ہیں

یہ محبت کی کہانی نہیں مرتی لیکن
لوگ کردار نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں وہ ٹوٹی ہوئی کشتیوں والے تابشؔ
جو کناروں کو ملاتے ہوئے مر جاتے ہیں

 

 

 

 

 

 

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